सोमवार, 13 नवंबर 2017

!! नन्हें-नन्हें बच्चे हैं ये खेलने-कूदने दे इन्हें !!


असीम आसमान
है उनके सामने
पर पंखों में अभी
उतनी जान नहीं।

धीरे-धीरे सीख लेंगे
वे भी एकदिन उड़ना
अभी सीखने दें चलना
अभी सिखाए उड़ान नहीं।

उनकी भी एक फ़ितरत
एक अलग अपना स्वभाव है
इंसान हैं वे भी हमारे
सपने पूरे करने का सामान नहीं।

हम जो कर न पाए
हमें जो मिल न पाया
कोमल मासूम कंधों पे
डाले वे अधूरे अरमान नहीं।


नन्हें-नन्हें बच्चे हैं ये
खेलने-कूदने दे इन्हें
जिंदगी फिर कभी होगी
बचपन जैसी आसान नहीं।



!! बच्चों के हक की बात !!


कुछ बच्चे आधे-अधूरे कपड़ों
आधे-अधूरे भरे पेट के साथ
रिक्शा स्टैंड के पास
उस औरत को घेरे खड़े थे।

वो अड़ी थी कि रोज़ का आना है
क्या वो रोज ही पैसे देगी?
हमें भी भूख रोज लग आती है
बच्चे इस बात पे अड़े थे।

कभी हाथ फैलाते
कभी पेट पे फेरते हाथ
कभी पल्लू खींचे तो कभी
उसके पैरों को पकड़ रहे थे।

झकझोर दिया उसने
उन नन्हें खुरदरे हाथों को
जो बार-बार माँगकर
उसे परेशान कर रहे थे।

चल दी वो उसे जाना था
एक विशेष कार्यक्रम में आज 
देना था बाल दिवस पे भाषण 
करनी थी बच्चों के हक की बात।

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

!! सैनिक!!


घर दरवाजे सब बंद करके
रातों को जब हम सोते हैं
हमारी नींद में ख़लल पड़े न
इसलिए सीमा पे वे होते हैं।

मटका, सुराही, एसी, फ्रीज
इनमें जब हम गर्मी मिटाते हैं
उस चिलचिलाती गर्मी में भी
वे सीमा पर गश्त लगाते हैं।

गर्म कपड़ा,खाना,पानी और
रजाई में जब हम दुबके होते हैं
उस सर्दी में भी सैनिक सीमा पे
लिए खून में उबाल डटे रहते हैं।

माँ की दवाई, बहन की सगाई
बच्चों का मुंडन भी छूट जाता है
पर सीमा से समझौता कर कभी
कोई सैनिक घर नहीं आता है।

होली, दिवाली, राखी, तीज
सब उनका सीमा पर ही होता
कभी-कभी तो बच्चा पिता को
पहली बार तिरंगे में ही देखता।

उनका जो ऋण है हम सब पर
वो कभी चुकाए नहीं चुकता है
पर उनके परिवारों को दे सहारा
थोड़ा-सा वो कम हो सकता है।