मंगलवार, 16 जनवरी 2018

!! आज आख़िर उन्होंने वो एक कमरा भी कर दिया ख़ाली !!

बच्चों-सी आदत थी उनकी
घर बिखेर के रख देती थी
जूठा कर देती थी सामान
कहीं टिक के नहीं रहती थी।

इतने सवाल करती थी सबसे
कि सारा घर परेशान हो जाता
मँडराते रहती खोजती सबको
कोई उनके पास नहीं आता।

चैन से बैठती नहीं एक पल
किसी भी कमरे में चली जाती
बंद करना पड़ता फिर कमरे में
समझाने से कुछ न समझती।

खाना कमरे में ही भेज देते
नहाने बाहर लाया जाता था
दिन में दो-चार बार झाँककर
कोई कमरे में देख आता था।

हाँ,नाती पोता नहीं,माँ थी वो
नब्बे पार कर चुकी बेकार माँ
हज़ारों नख़रे सह चुकी अब
नख़रे दिखाने को तैयार माँ।

पति बिन जी रही उदास माँ
पेंशन तक न देने वाली माँ
ऊँचा सुनने, बोलनेवाली माँ
बच्चों पर बोझ बन चुकी माँ।

आज आख़िर उन्होंने वो एक
कमरा भी कर दिया ख़ाली
छोड़ गयी उसका वो बिस्तर
आधी जूठी रोटी,पूरी थाली।

मुक्ति न मिले तो भी उनको
अगली बार बचपन तो मिलेगा
जिन आदतों से घर परेशान था
उन्हीं पर फिर हर कोई रीझेगा।

रविवार, 14 जनवरी 2018

!!सपनों को पतंग-सा आकाश मिले,रिश्तों में आ जाए गुड़ कि मिठास!!


नयी फ़सल, नया साल और
नयी राशि में सूर्य का प्रवेश
अलग-अलग नाम से एक ही
उत्सव मना रहे हैं सारे प्रदेश।

प्रांत अलग तो नाम अलग पर
मूल में तो एक ही है सभ्यता
शुभ समय की आगवानी और
प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता।

लोहड़ी, पोंगल या हो संक्रान्ति
मिलजुल मनाए तभी है उत्सव
मिठाइयों की मिठास मन,वाणी
जीवन में घुल जाए तो महोत्सव।

सपनों को पतंग-सा आकाश मिले
रिश्तों में आ जाए गुड़-सी मिठास
तिल-सा पावन हो मन हम सबका
जीवन हो खिचड़ी-सा सरल स्वाद।




सोमवार, 13 नवंबर 2017

!! नन्हें-नन्हें बच्चे हैं ये खेलने-कूदने दे इन्हें !!


असीम आसमान
है उनके सामने
पर पंखों में अभी
उतनी जान नहीं।

धीरे-धीरे सीख लेंगे
वे भी एकदिन उड़ना
अभी सीखने दें चलना
अभी सिखाए उड़ान नहीं।

उनकी भी एक फ़ितरत
एक अलग अपना स्वभाव है
इंसान हैं वे भी हमारे
सपने पूरे करने का सामान नहीं।

हम जो कर न पाए
हमें जो मिल न पाया
कोमल मासूम कंधों पे
डाले वे अधूरे अरमान नहीं।


नन्हें-नन्हें बच्चे हैं ये
खेलने-कूदने दे इन्हें
जिंदगी फिर कभी होगी
बचपन जैसी आसान नहीं।