सोमवार, 24 जुलाई 2017

!! उसी की छाया में खड़े हो उसे पानी देने का सुकून !!


ये चिलचिलाती गर्मी जब
शाम भी लगती है दोपहर
नन्हीं घास से बड़े पेड़ तक
सब पे बरसे सूरज का कहर।

प्यासे पेड़ों को पानी देना
सावन-सा शीतल लगता है
घासों को जड़ से भीगोना
फागुन-सा मन को भरता है।

ढलती धूप, पानी का संग
तपिश को कम कर देती है
धीरे-धीरे गरम हवाएँ भी
खुद में ठंडक भर लेती है।

पेड़ों की छाया में खड़े हो
उनके ऊपर पानी बरसाना
हवा के साथ कुछ बूँदों का
फिर वापस हम पर आना।

बड़ा सुकून होता उन बूँदों में
अंतर्मन को तर कर जाती हैं
देने से ही दिल खिलता है
शायद यही हमें समझाती हैं।

इंसान हो या हो फिर दरख्त
अलग ही होता है
उसी की छाया में खड़े हो
उसे पानी देने का सुकून ।

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

!! बेटी से अपने घर को रौशन करो, बेटी को घर का चिराग बनाओ !!

नन्ही-सी कोंपल अभी पनपी कि
काँटों ने उसको उखाड़ ही फेंका
न सुबकी,न रोयी बस वो तड़पी
लांध गए क्रूरता की सारी रेखा।

फिर से उसने नया कोख ढूँढा
इसबार बाहर की रोशनी देखी
पर चाहिए था घर का चिराग़
पालना बनी मंदिर की सीढ़ी।

कूड़े, झाड़ी, नाली से था बेहतर
कि उन्होंने उसे सीढी पर छोड़ा।
नौ महीने ख़ून से सींचने के बाद
जाने कैसे ममता ने नाता तोड़ा!

न सोच, न समझ, न दुनियादारी
बस स्पर्श व प्रेम की पहचान थी
लिपटने,सिमटने की आदत थी ही
गर्भ से निकलने से भी अनजान थी।

सिमटी, सकुचायी, सहमी,अकेली
प्रेमभरे आलिंगन के लिए तड़पती
माँ के दूध की बूँद तक न थी मिली
गले से आवाज़ भी कैसे निकलती।

रक्तिम-सा रंग, रूई-सी मुलायम
एक पुराने सूती कपड़े में लिपटी
रोते-रोते हो चुका था वो भी गीला
उसी में कल की जननी थी सिमटी।

तभी दो कदम ठिठके वहाँ आकर
जाँच लिया आसपास नज़र दौड़ाकर
एक नज़र आसमा वाले से मिलाया
ले गया कली को हृदय से चिपकाकर।


मानो बूढ़े माली के बूढ़े-से पेड़ पर
आ गयी हो अनायास कोई कली
वैसे ही रौनक़ से भर गया आँगन
हर पत्ती,हर डाली खिली-खिली।

वहाँ किसी को उसकी ज़रूरत नही
यहाँ था उसका इंतज़ार जाने कब से
इंसान कितनी भी कर ले कोशिश
बड़ा नही हो सकता कभी वो रब से।

नन्हें-नन्हें कदम, पायल की खनक
घर व जीवन में वो जीवन ले आयी
यूँ ही चहकते-महकते नन्ही कली
करने लगी थी अब पढ़ाई-लिखाई।

न माँ की तरह, न पिता की तरह
सबसे अलग उसने सूरत थी पायी
पर सीरत पे उसके तो माँ-बाप की
हूबहू उनसी ही  परछाईं थी आयी।

पढ़ लिखकर पैरों पर खड़ी हो गई
फिर कुछ अधूरा सा लगता था उसे
जैसे कोई हिस्सा उसका अलग हो
अपनाने के लिए विकल हो जिसे।

माँ को बतायी उसने मन की बात
कि अलग कुछ करने का मन है माँ
अनाथ बच्चे और बेसहार बूढ़ों की
ममतामयी माँ बनने का मन है माँ।

बेघर बचपन,बेसहारा बूढ़ों के लिए
उसने एक घर-सा आश्रम बनाया
माँ-बाप समझ रहे थे उसका मन
पर फिर भी उन्होंने कुछ न बताया।

एकदिन मंदिर की सीढी पर एक
दम्पत्ति सिर पटक-पटक रो रहे थे
बेटे ने घर से निकाल दिया था उन्हें
सीढ़ियों पे कुछ खोया ढूँढ रहे थे।

करुणा से भरी वो कोमल हृदया
दोनों को लेकर आ गयी अपने घर
बिठाकर, ढाँढस बँधाकर देखा जब
स्त्री को देख वो गयी सहसा ठिठक।

लग रहा था जैसे दर्पण हो सामने
ख़ुद को ही सफेद बालों में देखा
वही नैन-नख़्स,वही क़द-काठी औ
वैसी ही सिर पर सिलवटों की रेखा।

माँ ने उसे सब बता दिया सच-सच
पर मन में उसके कोई मलाल नही
उनकी हालत देख उमड़ी करुणा
बह गया उसमें हर ग़लत औ सही।

जननी की जननी बनकर पाला
पिता को भी छत व छाया बख़्सी
उँडेल दिया उसने सारा प्यार उनपर
जिसके लिए थी सीढ़ियों पर तड़पी।

खुल गए थे सारे राज फिर भी
रज़ामंदी से कुछ खुला नही था
धूल गए थे उसके सारे शिकवे
उनदोनों का अभी धुला नही था।

जो भी आता आश्रम में उसके वे
कहते बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ
बेटी से अपने घर को रौशन करो
बेटी को घर का चिराग बनाओ।

ये चिराग कभी घर जलाएँगे नही
शुरुआती लौ को हवा से बचाओ
लड़खड़ाने से पहले ही थाम लेंगी
एकबार उन्हें खड़ा होना सिखाओ।

करुणा,वत्सलता बचाने के लिए
बेटी को तो हमें बचाना ही होगा
संतति व संस्कृति बचाने के लिए
बेटी को तो हमें पढ़ाना ही होगा।

अगर छोड़ते रहे बेटियाँ सीढ़ियों
नाली, कूड़े और रास्ते पर यूँ ही
तो इन्ही जगहों पर ही भटकेगा


बुढ़ापा गिरता-संभलता ख़ुद ही।

मंगलवार, 20 जून 2017

!! मेरा पेड़ पहले की तरह गाता नहीं !!


मेरी खिड़की से दिखते दो पौधे
पता नहीं मित्र हैं वे या रिश्तेदार
पर संग-संग हँसते बतियाते देख
दिख जाता उनका गहरा प्यार।

कभी पत्ते, कभी डालियाँ तो
कभी हवाओं से ख़ुशबू बाँटते
मैं देखा करती अक्सर उनको
बारिश की बूँदों के संग नाचते।

बसंत, पतझड़, सावन सब जीते
वे भी मेरे साथ-साथ बड़े हो रहे थे
मज़बूत तना, घनी पत्तियों के संग
वे छोटे पौधे से अब पेड़ हो रहे थे।

गर्मी, बारिश में गरीबों  की छतरी
तो शाम बच्चों का झूला बन जाते
दोपहर में गायें सुस्ताती उनके तले
शाम में चाँद को पत्तों से निकालते।

उनमें से एक पेड़ था आम का और
दूसरा था वो,फल नहीं आते जिसमें
फल के अलावा छाया, शीतलता
सौंदर्य सब कुछ बराबर था उसमें।

गर्मी की छुट्टियों में नानी घर गयी
हम वहाँ आम खाने जाया करते थे
वहाँ के पेड़ भी बहुत प्यारे थे मगर
मुझे अपने ज़्यादा अच्छे लगते थे।


जब भी खिड़कियों के पास बैठती
मुझे अपने उन पेड़ों की याद आती
तब ममेरे भाई-बहनों को बिठाकर
उन्हें अपने पेड़ के बारे में बताती।

छुट्टियों के बाद जब वापस आयी
रात से सुबह के इंतज़ार में लग गयी
थकी थी बहुत पर अपने पेड़ों को
देखने की ललक में कहाँ सो पायी।

पौ फटते ही दौड़ी खिड़की पर मैं
ये क्या?वहाँ एक ही पेड़ खड़ा था
पास ही कुछ शेष था कटा ठूँठा-सा
लगा घायल-सा जैसे कोई पड़ा था।

गयी आँगन में दादी के पास पूछने
दादी एक पेड़ वहाँ से गया कहाँ?
पता चला उसे काट दिया है सबने
क्योंकि फल नहीं लगते थे वहाँ।

कुछ टूटा अंदर, कुछ छूटा बाहर
चुपचाप गयी मैं उन पेड़ों के पास
जैसे घर का कोई चला गया हो
वैसे ही आम का पेड़ था उदास।

लिए एकाकी मन, सूना-सा हृदय
खड़ा था मित्र के कटे धर के साथ
याद आया वो दृश्य जब बग़ल के
दादा के हाथ था मृत दादी का हाथ।

कटे तने से कुछ तरल-सा टपका था
शायद ये पेड़ों का लहू होता होगा
आम का पेड़ इतना व्यथित था कि
आँखें, आँसू मिले तो अभी रो देगा।

लिपटना चाहता था मित्र से एक़बार
पर इंसान तो मित्र का धर ले गए थे
भुलाना चाहता था इसे हादसा समझ
पर कटा जड़ उसके सामने छोड़ गए थे।

हर दिन देखना, हरदिन ही तड़पना
हाय!मैं रूक न पायी वहाँ ज़्यादा देर
पर घूम रहा था विचारों में अनवरत
एक कटा और एक बचा खड़ा पेड़।

खिड़की से अकेला पेड़ लगता जैसे
दादाजी लगते दादी के जाने के बाद
एक चेहरा गढ़ती मन में उसकी तो
दिखता बस अकेलापन और विषाद।

शाम को बच्चे लटक रहे थे उसपर
उसने एक़बार भी उन्हें हटाया नहीं
अपने फल, शीतलता, छाया को
उनसे कभी लोगों से छिपाया नहीं।

अब भी मीठे आम ही देता है वो
मन में किसी के लिए भी बैर नहीं
मित्र के हंता को भी फल देता है
उसके तो सब अपने कोई ग़ैर नहीं।

हाँ,पर बारिश में अब बस भीगता है
पहले की तरह मगन हो नाचता नही
हवाओं के संग पत्तियाँ हिलती भर हैं
मेरा पेड़ पहले की तरह गाता नहीं।