गुरुवार, 21 जनवरी 2021

!!माँ का जूठा!!





अक्सर कहा जाता है कि जूठा खाने से प्रेम बढ़ता है लेकिन बड़े आश्चर्य की बात है कि जो हमसे सबसे ज़्यादा प्रेम करती है इस दुनिया में वो माँ कभी भी हमें अपना जूठा नहीं खिलाती।



हाँ शायद ही कोई माँ बच्चों को अपना जूठा खिलाती है बशर्त्ते कि कोई मजबूरी न हो। मुझे तो याद नहीं कि कभी माँ ने कहा हो अपना जूठा खाने। एक तो वो हमें भर पेट खिला के खाती हरदिन।



माँ शायद धरती कि अकेली ऐसी प्राणी होती है जो खुद भूख से छटपटाती भी रहे तब भी बच्चे को पहले न सिर्फ़ खिलाती है बल्कि बिना किसी उद्वेग के उसे प्रेम से खाते देख निहारती भी है। वरना भूख का वेग सहना आसान नहीं होता।



वैसे भी माँ बच्चे को जूठा क्यों खिलाएगी वो तो अपना पूरा हिस्सा ही खिला देती है। उसे पता होता है कि ये चीज़ बच्चे को पसंद है या कम है बस माँ की तो भूख ही मर जाती है। नहीं तो अचानक से वो समान उन्हें नापसंद हो जाता है।कभी कभी माँयें बहुत भोली हो जाती है।



माँ कभी साथ भी खाती तो ज़्यादातर तो यही होता कि वे पहले नहीं उठती। बचपन में तो याद है कि साथ खाने बैठाती तो पहले हमें भरपेट खिलाती, सारी अच्छी चीज़ें भी खिला देती। ऐसा कौन करता है? शायद कोई नहीं। इस दुनिया में तो कोई नहीं।



हाँ माँ एक परिस्थिति में जूठा खिलाती थी लेकिन वास्तव में वो भी जूठा होता नहीं था। जैसे घर में सबके हिस्से कुछ बँट रहा है। बच्चे बड़े सबको मिल रहा है। खाना ज़रूरी है। माँ को पता है कि ये चीज़ मेरे बच्चे को बहुत पसंद है। बस फिर माँ चखने का दिखावा कर ऐसे करती जैसे उन्हें वो बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा और झट से बच्चे को पकड़ा देती कि तू ही खा ले।



आज ऐसे ही अचानक याद आया कि मैंने तो कभी भी माँ का जूठा खाया नहीं या यूँ कहे कि माँ ने खिलाया नहीं।फिर भी वो प्रेम सबसे ऊपर। माँ रहे या माँ न रहे उनकी जगह कोई नहीं ले पाता क्योंकि वो जगह कभी ख़ाली ही नहीं होती। माँ माँ होती है कोई नौकरी का पद थोड़े न कि कोई भी उनकी जगह ले ले।



है कि नहीं।



इस जूठा खाने, साथ खाने ऐसी किसी भी औपचारिकता से बहुत ऊपर होता है माँ का प्रेम।





सबसे अच्छी बात ऊपरवाले की कि हर प्राणी के हिस्से एक माँ होती है, उसकी ममता होती है। सहेज कर रखे संभाल कर रखे बहुत अनमोल है ये रिश्ता।एक बार ही है मिलता।

गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

!! ये बीता जो साल !!



ये बीता जो साल

ले गया कुछ चीज़ें ऐसे संग अपने

जैसे छोड़ी हो आँखें

ले ली उससे नींदे और सारे सपने

 

बहुत कुछ दिखाया

बहुत कुछ सिखाया

 

रिश्ते देखे

उनका खोखलापन देखा

ख़ालीपन देखी

कँपा दे वो अकेलापन देखा

 

देखा मैंने ज़िंदगी के चेहरे से नक़ाब उतरते

मातम को लड़ते आँसू और ग़म को झगड़ते

 

ये साल नहीं था कोई सच का शीशा

जो जैसा वो बिल्कुल वैसा ही दिखा

सब क्षणिक यहाँ कुछ भी न स्थायी

ये बात बड़ी निष्ठुरता से समझायी

 

 ज्ञान की किताबें जो सीखा न पायी

साल ने कूट कूट कर सब पढ़ा दिया

भ्रम मोह सबके मखमली चादर को

बिन लाग लपट झटके में हटा दिया

 

छीना तो इतना कि नए साल का

पहला आशीर्वाद तक छीन गया  

पाठ भी बहुत बड़ा पढ़ाया इसने

वक्त के सामने हम बौने बता गया

 

शुक्रिया तो न निकलेगा

पर ठीक है अब जाओ फिर न आना तुम

वैसे तुम्हें भुलाना नामुमकिन

हमारे नभ के सितारे हुए हैं तुझ में गुम 

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

!! माँ की चाय !!



अधिकांशतः हर माँ की एक आदत सी होती है चाय। आदत से भी ज़्यादा ज़रूरत। अगर इसे मजबूरी भी कहे तो अतिशयोक्ति न होगी। हाँ उन्हें चाय चाहिए होती है पूरे दिन घर के काम में खुद को झोंकने के लिए। सबको खिलाने से पहले अग्र भूख लग जाय तो उसको मारने के लिए। कभी ग़ुस्से को दबाने के लिए कभी खुद को समझाने के लिए हालात को भुलाने के लिए कभी तो दो पल सुस्ताने के लिए।

 

मैंने कभी भी माँ को बेड टी लेते नहीं देखा। कभी भी किसी को उन्हें चाय पहुँचाते नहीं देखा। कभी तड़के सुबह या अलसायी शाम भी चाय पीते नहीं देखा। मतलब उन्हें चाय का लुफ़्त उठाते नहीं देखा। उनकी चाय तो चूल्हे से हल्का बाजू खिसक के ख़त्म हो जाती। कभी सब्ज़ी को दूसरी बार चलाने का समय आए उससे पहले ख़त्म हो जाती। कभी कपड़े सुखाते सुखाते।

 

अच्छी सहेली होती है चाय ख़ासकर माँ के लिए। उसकी घूँट में वो मन की घूँट उतार देती हैं। उसके साथ जीवन का ताप कड़वाहट सब पी लेती हैं। कभी कभी उनकी मीठी चाय में आँखों से एक दो नमकीन बूँदें भी चुपके से फिसल जाती है।

 

क्या कहे?

बस यही कि माँ के अगर चाय की लत है तो उनके साथ पिया कीजिए। अकेले चाय पीती माँ ख़ाली होती जाती है भीतर से। अपने साथ से उनके मन को भरिए क्योंकि जब माँ नहीं रहेगी तो आप इतने ख़ाली हो जाएँगे कि दुबारा कभी न भर पाएँगे।

सोमवार, 30 नवंबर 2020

!! कार्तिक पूर्णिमा समा चकवा देव दिवाली !!



कार्तिक पूर्णिमा के अनेक आध्यात्मिक पक्ष हैं। कितनी कथाएँ मान्यताएँ जुड़ी हैं इससे। पर इससे जुड़े दो प्रसंग है जो कार्तिक पूर्णिमा को मेरे लिए ख़ास बनाते हैं। पहला मेरे बचपन की याद समा चकवा के जाने का दिन। दूसरा मेरी अम्मा का देव दीपावली के लिए उत्साह।

 

पहले से शुरू करते हैं। समा चकवा एक परंपरागत लोक संस्कृति का हिस्सा है हमारे यहाँ, बिहार में। छठ के कुछ दिन पहले से समा चकवा खेलना शुरू करती हैं घर कि बेटियाँ। हाँ बड़ी सुंदर सी संस्कृति है ये बेटियों की तरह ही सहज खनकती छनकती। मिट्टी का समा चकवा वृंदावन चुगला खरिच बहुत से अलग अलग प्रकार की मूर्तियाँ बनायी जाती हैं। समा को छोड़ सब घर पे बनाते हैं। समा बाज़ार से आता है। गाँव के बाज़ार से। गाँव की मिट्टी का बना।गीली मिट्टी से गढ़ा जाती हैं जब ये मूर्तियाँ तो साथ साथ बहुत कुछ गढ़ता है – संस्कृति, लोक, व्यवहार, विरासत प्रकृति से सामंजस्य बहुत कुछ जो दिखता तो नहीं प्रत्यक्ष लेकिन गहरा गढ़ता है। मन मस्तिष्क पर छप जाता है।

 

अपने अनुभव से बता रही हूँ। पिछले कई सालों से मैंने गाँव का दर्शन तक नहीं किया, समा चकवा खेले तो दशकों हो गए लेकिन अब भी हर कार्तिक में में अपने बचपन के गढ़े उस समा चकवा को मन से सजीव खेलती हूँ।

 

समा चकवा विशेष रूप से भाई बहन के प्रेम का रिश्तों का लोक त्योहार है। कार्तिक पूर्णिमा तक हर शाम घर की बेटियाँ लाल बांस की टोकरी हमारे यहाँ दौरी कहते हैं उसमें समा जो की बहन होती है उसे बीच में रखकर चकवा जो भाई है वो रहता है और भी बाक़ी सब गढ़ी मूर्तियाँ रहती हैं उस टोकरी में, उसे लेकर बैठ जाते हैं आँगन में। ठंढ ज़्यादा है तो बरामदे पर। फिर सजती है लोक गीतों की सुंदर महफ़िल। माँ बेटी बहू दादी सब शामिल होती है। भाई बहन के गीत बीच बीच में ठिठोली तंज सब समाहित रहता है। बच्चों का उत्साह, बहू के मायके की याद, दादी के अनुभव सब हरदिन ही इसको रौनक़ से भरते हैं। कभी बोरियत नहीं होती कि ठंड है अलसाने का मौसम है आज न खेले। न, पूरे दिन साँझ की प्रतीक्षा होती है कि समा खेलना है।

 

समा खेलना मतलब साँझ होते अधिकांशतया घर की बेटी समा की दौरी (टोकरी ) जो कि बांस की होती है और लाल हरे पीले रंग से रंगी होती है उसे लेकर किसी बरामदे पर रखती है। वहाँ बैठने का कुछ बिछाती है। फिर एक एक कर घर में सबको बुलाती है। सबसे पहले निमंत्रण स्वीकार करती है दादी। फिर एक एक कर सब आ जाते हैं। फिर गीत का सिलसिला चलता है। पाँच दस पंद्रह कितनी भी हो सकती है गीतों कि संख्या। ये पूर्णतया गानेवाले के समय और उस दिन के उसके मिज़ाज पर निर्भर होता है। गाने के बाद उस समा की दौरी में एक होता है वृंदावन जो कि नीचे मिट्टी का बना होता है और उसपर सींक लागी होती है और दूसरा प्राणी होता है चुगला वो भी मिट्टी का बना होता है और उसमें लगा होता है पटुआ। दोनों को जलाया जाता है थोड़ा थोड़ा। पर  दोनों के जलाने में बड़ा अंतर। वृंदावन जलता है तो उसको जल्दी से बुझाने के लिए, उसको बचाने के लिए। लेकिन चुगला को जलाया जाता है उसको सजा देने के लिए। सीधे शब्दों में कहे तो एक अच्छाई का प्रतीक तो दूसरा नकरात्मकता का।

 

ऐसे ही बहुत सी छोटी छोटी बातें क्रियाएँ होती है जिसे हम समा खेलना कहते हैं। उस समय धान का समय होता है। धान की बालियाँ पक चुकी होती हैं तो उसे समा को खाने के लिए देते हैं। बहुत कुछ होता है बाहर सामने और भीतर गहरे मन में। फिर उस समा की दौरी की वापस रख देते हैं अंदर ज़्यादातर गोसाईं घर में।

 

कार्तिक पूर्णिमा तक हर दिन बिना नागा उसी उत्साह प्रेम से समा खेला जाता है हर साँझ।

 

कार्तिक पूर्णिमा के दिन समा का विसर्जन होता है नज़दीक की किसी नदी में। समा बेटी है बहन है उसकी विदाई होती है। धूमधाम से पर भारी मन से। फिर आने का कह उसे जाने दिया जाता है। विसर्जन के लिए जाती है घर के बेटी और दादी या यूँ कहें घर के बच्चे व दादी और साथ में मदद के लिए और भी कई लोग। उसदिन लगता है जैसे सारा गाँव ही नदी की ओर जा रहा है, सारा गाँव ही गा रहा है। नदी पहुँच समा को विदाई और विदाई के बाद सुंदर सा कार्तिक मेला। शायद उस विदाई के वेग को संतुलित करने के लिए मेला का आयोजन आरम्भ हुआ होगा।

 

ये है मेरे लिए कार्तिक पूर्णिमा। समा के जाने की रात, बैलगाड़ी में बैठ दादी भाई बहनों संग नदी की ओर जाने की रात, खुले आसमान के नीचे निर्भय होकर लोक को गाने की रात, सैकड़ों समा खेलनेवालियों का ताँता उनके सिर पे दौरी उसमें जलता दीया।

कार्तिक की ठंड और समा चकवा के यादों की गर्माहट का सुंदर समागम है मेरे लिए ये पूर्णिमा।

 

दूसरी याद है कार्तिक पूर्णिमा की मेरे लिए विशेष वो है अम्मा कि देव दीपावली। उन्हें बड़ा उत्साह होता था कि इसबार देव दिवाली में बनारस जाएँगे, अयोध्या जाएँगे। जाती भी थी। बनारस तो कई बार गयी लेकिन जितनी बार गयी उससे कहीं ज़्यादा बार नहीं जा पायी। घर की ज़िम्मेदारी। खुद सास बनने के बाद भी अंत तक वो अपने बहू होने की ज़िम्मेदारी में पूरी तरह ही लिपटी रही।

 

जिसबार जाती आहा क्या उत्साह होता उनका। वहाँ से ही फ़ोन करती। विडीओ कॉल करके घाट दिखाती आरती दिखाती बाद में फिर फ़ोटो विडीओ भेजती भी। वहाँ जलाने के लिए मिट्टी के दीये घी बाती सब घर से ले जाती थी। घी तो खुद अपने हाथों से बनाती। अलग से रखती कि ये कार्तिक के लिए है।

 

जब नहीं जा पाती जो कि अक्सर ही होता तब भी बड़े उत्साह से घर पर मनाती थी देव दिवाली। जितने तुलसी के पौधे थे उनके जो कि दर्जनों थे सबके सामने दीये बस जलाती नहीं सजाती। भगवान के पास, गोसाईं के पास, आँवला के पास। पूरा जगमग जगमग हो जाता फिर फ़ोन करती बेटा बेटी को। विडीओ कॉल। देख लो तुमलोग भी। प्रणाम कर लो।

ये पहली देव दिवाली है उनके बिना। बिना समा चकवा के क़िस्सा के बिना। उनके रहने तक यादें वर्तमान लगती थी लेकिन उनके जाने के बाद यादें सच में अतीत लगने लगी हैं वो भी बहुत पीछे छूट गया, कभी न दुहरा पाने वाला अतीत।

 

ख़ैर कार्तिक पूर्णिमा की सबको बहुत बहुत बधाई।

 

 

शनिवार, 28 नवंबर 2020

ये कौन-सी भाषा है?

 




 

आजकल अक्सर लोग पूछते हैं कि ये जो तुम्हारा विडीओ होता है उसमें कौन-सी भाषा है? इस सवाल पूछने से कोई परेशानी भी नहीं है। अब मेरे सामने भी कोई किसी और प्रांत की क्षेत्रीय भाषा में बोले तो मैं भी अधिकांशतया शून्य ही होती हूँ।

 

लेकिन कभी कभी परेशानी होती है। होती है प्रश्न पूछने के लहजे से, प्रश्न के साथ आए उपेक्षा से, उपहास से। ये पता है कि ये बिहार से है। ओ बिहारी भाषा है? ठहरो भाई साहब बहन जी बिहारी कोई भाषा नहीं है। एक तो इन सिनेमावालों ने हमारे क्षेत्रीय भाषाओं की ऐसी खिचड़ी बना के पेश कि है लोगों के सामने। मतलब कोई मुँह में पान भर ले बिना कारण कहीं भी हम हम लगा के थोड़ा भोजपुरी लहजा ले ले बस हो गया।

 

अमेरिका में जाकर पच्चीस साल जीभ का शीर्षासन कराने के बाद भी अंग्रेज़ी बोलने पर समझ में आ जाता है कि ये मूल अमेरिकी बोलने बाला नहीं है। जबकि सारी दुनिया ही अंग्रेज़ी में साँस लेके को आतुर है तब ये हाल है। फिर कोई मुंबई के महल में रहनेवाला दू दिन में हमारी क्षेत्रीय भाषा कैसे आत्मसात कर लेगा। फिर ऐसे में निकलता है बिहारी भाषा। मुंबइया फ़िल्मों की दें।

 

बिहार में अनेको मीठी लोक भाषाएँ हैं। सबका अलग मिज़ाज है अलग मस्ती है। हर भाषा में लोक गीत है। बहुत समृद्ध सक्षम भाषाएँ हैं। मेरी भाषा भी उन्ही सबमें से एक है बज्जिका। मिथिला में बोली जाती है। सहज सरल मिठास से भरी भाषा। मेरे गाँव की भाषा। मेरे शहर की भाषा। मेरे अंचल की भाषा। मेरे यादों की भाषा। मेरे बचपन की भाषा। मेरी पहली भाषा। मेरी वास्तविक मातृभाषा।

 

हाँ तो लोग जब जानने के लिए उत्सुकता वश पूछते हैं तो मैंने भी शिष्टाचार से बता देती हूँ। लेकिन जब लहजे से उपहास की गंध आए तो मेरा जवाब भी सीधा कहाँ रहता?

 

ये कौन-सी भाषा बोलती हो तुम?

 

ये भगवान राम के ससुराल की भाषा है।

ये वो भाषा है जिसमें मर्यादा पुरूषोत्तम को उनके सामने प्यार से मीठी गाली दी जाती है।

 

ये वो भाषा है जिसमें दशरथ महाराज से ठिठोली की जाती है।

 

ये वो भाषा है जिसमें सीता राम के अनगिनत पद गीत आज भी मिथिला में हर रामनवमी हर जानकी नवमी हर विवाहपंचमी को गाए जाते हैं।

 

सच कहे तो हरदिन ही कहीं न कहीं कोई न कोई प्रेम से इस भाषा में भगवान के लिए कुछ न कुछ गा ही रहा होता है।

 

रामजन्म पर जहाँ इसी भाषा में बधाई होती है वहीं विवाह पंचमी के अवसर पर एक से एक ठिठोली के गीत।

 

सोचकर ही गर्व रोमांच से मन गदगद हो जाता है कि अरे इसी भाषा में भगवान के सामने मिथिला की स्त्रियों उन्हें मीठी गाली दी थी। वेद से जिनकी स्तुति होती है वे भगवान हमारे मिथिला के पहुना है और मिथिला की लोक भाषा में लोक गीतों से उनका सत्कार होता है।

 

मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम का चरित्र देखे तो उनके समूचे चरित्र में सबसे ज़्यादा रसमय प्रसंग है हास परिहास की दृष्टि से तो वो विवाह के समय मिथिला में ही है।

 

तो मेरी ये भाषा सृष्टि के स्वामी के ससुराल की भाषा है।  

शनिवार, 7 नवंबर 2020

माँ

कहते हैं न कि माँ बनने के बाद उसकी अहमियत समझ आती है। सच नहीं है ये। मुझे भी लगता था कि ऐसा ही है। अब मैं समझ पा रही हूँ कि माँ ने मेरे लिए क्या-क्या किया। कितने कष्ट उठाए। कैसी उनकी भावनाएँ रही होंगी। मैं सब समझ गयी।

 

माँ बनने के बाद लगने लगा था मुझे कि मैं माँ को अब समझने लगी।

 

 

लेकिन नहीं। माँ बनकर माँ समझ में आ जाए इतना सरल नहीं होता। माँ क्या है क्या उनकी अहमियत क्या उनकी जगह ये वाकई में माँ के जाने के बाद पता चलता है। जब वो न हो तब समझ आता है वो क्या मिला था ऊपरवाले से। जब तक वो जगह भरी रहती है तब तक ख़ालीपन का अहसास कहाँ से हो? इसमें कुछ ग़लत भी नहीं।

 

 

लेकिन सच में माँ होना माँ के न होने पर सबसे ज़्यादा समझ आता है। जब आपके सुख और दुःख दोनों अनछुए निकल जाते हैं। बिना किसी की नज़र पड़े बिना किसी की फिक्र दुआ के।

 

 

ज़िंदगी तो चलती ही रहती है लेकिन एक ख़ालीपन के साथ। कभी न भरनेवाला ख़ालीपन, हमेशा कचोटने वाला ख़ालीपन, रात को जगा देनेवाला ख़ालीपन, साँझ से भोर से आसमान से बारिश से चिढ़ा देनेवाला ख़ालीपन। ख़ालीपन से भी कहीं ज़्यादा। खोखला। एक खोखले हिस्से के साथ बिना किसी उम्मीद के जीने का नाम है माँ का न होना।

 

खुशनसीब है जिनके घर में माँ है। आपके घर में है तो ऊपरवाले का अहसान मानिए कि उसने अपना एक अक्स आपके आँगन में भेज रखा है। दुआ को प्रेम से संभाल के सम्मान से स्वीकार कीजिए क्योंकि ये दुआएँ अमर नहीं होती।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2020

पतझड़ के पत्ते पेड़ों से पैरों तक



परिवर्तन प्रकृति का स्वभाव है। यही स्वभाव समय में भी है यही स्वभाव ज़िंदगी का भी। और तो और हमारा शरीर भी इसी स्वभाव का है। बालपन यौवन बुढापा शरीर परिवर्तन और फिर से परिवर्त्तन का एक चक्र।



इसलिए यहाँ स्थायित्व की अभिलाषा रखना खुद को धोखे में रखना है। समझदारी तो ये है कि हम परिवर्तन को पूर्ण रूप से स्वीकारना समाहित करना सीख लें जैसे कि प्रकृति करती है।





अभी पतझड़ का मौसम है। पतझड़ नाम से हाई स्पष्ट है कि पत्ते झड़ जाएँगे। लेकिन पेड़ों से पत्तों के झड़ने की इस क्रिया परिवर्तन को भी प्रकृति कितनी सुंदरता से स्वीकारती है। रंगो से भर देती है धरती को वातावरण को और देखने वाली नज़रों को। अपनी हरियाली खो चुके लालिमा से अंत की ओर जाते ये पत्ते प्राकृतिक सुंदरती की अनुपम झाँकी बन जाते हैं।



ये है परिवर्तन को स्वीकारने का प्राकृतिक तरीक़ा जो हमारी आँखों को सुंदर मनहर दृश्य देता है, मन को सुकून देता है और ध्यान दें तो जीवन भर का दर्शन भी दे जाता है।



पेड़ों से लोगों के पैरों तक पहुँचे ये पतझड़ के पत्ते बहुत कुछ सीखाते हैं। सीखाते हैं परिवर्तन को सहज स्वीकार करना, सीखाते हैं समग्र में अपने हिस्से की सुंदरता जोड़ना। बहुत कुछ सीखा जाते हैं। जीवन का सार बता जाते हैं। पर सबसे बड़ी बात पतझड़ में जाते ये पत्ते बसंत में फिर आने का संदेश भी दे जाते हैं।



और पत्तों से विहीन हो चुका पतझड़ का पेड अद्भूत होता है। हर साल पतझड़ इसके पत्ते पत्ते ले जाए फिर भी हर वसंत ये नया पत्ते उगाए।



जो प्रकृति को पढ़ ले वो जीवन दर्शन समझ जाए।



है न।

प्रकृति के पास रहें

प्रकृति को पढ़े।

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

क्या कहूँ हताश हूँ निराश हूँ उदास हूँ

इतना क्रूर विभत्स डरावना 
दरिंदगी की सीमा से पार 
मार दी हमने फिर एक बिटिया 
उसका जाना हम सबपे उधार 

उसकी चीख उसके आँसू उसकी पीड़ा 
लौटकर आएगी हम तक ज़रूर 
रूह काँप जाए सोच भर के जिसे 
सही में मासूम बिटिया कितनी मजबूर 

दरिंदों  को जहां डर नहीं रह जाता 
वो समाज बड़ा होता भयानक डरावना 
न चुन्नी न साड़ी कुछ भी न सुरक्षित 
अब तो बचाना पड़ रहा है हमें पालना 

अपनी बच्चियों को लेकर साधारण माएँ 
मंगल चाँद कहाँ किस ग्रह पर चली जाँए ?
धरती पर समाज में रहकर भला वो कैसे 
अपनी बेटियों को तड़पकर मरने से बचाएँ ?

 क्या कहूँ हताश हूँ निराश हूँ उदास हूँ 
चुपचाप बैठी अपनी बिटिया के पास हूँ 

बुधवार, 26 अगस्त 2020

गाँव घुमा लायी वो निम्बू की महक



कभी-कभी एक छोटी सी चीज़ भी आपको ठहरा देती है भागते वक्त के साथ दौड़ते आपको थाम लेती है। ओ दृश्य ओ आवाज़ इतनी गहराई तक छूती है कि पाँव तो वर्तमान के संग चल रहा होता है पर मन तो कहाँ कहाँ भूली बिसरी यादों की गलियों में घूम रहा होता है। है न । होता है अक्सर ऐसा। सबके साथ ही।

आज ही सुबह यूँ ही टहलते अचानक से एक महक सी आयी। महक बहुत हाई जानी पहचानी सी। बहुत दिनों बाद ऐसी महक। मन बेचैन कि यहाँ कहाँ से ऐसी महक आयी? आँखें भी सजगता से मन का साथ दे रही है। यूँ कहीं पूरा दिल दिमाग़ सब मिल उस महक का स्रोत ढूँढने में लग गए। लेकिन आसपास दिखा न कुछ।

महक थी ताजे निम्बू की। हमारे गाँव में घर के पिछवाड़े अब भी होगा शायद वो निम्बू का पेड। जब भी उस पेड के पास से गुज़रो वो महक मन को धो देती थी। सारी निराशा की चिकनाई बिना बताए पिघला देती थी। जब कभी उस निम्बू को तोड़ो तो तोड़ने भर से महक हाथों पर चढ़ जाती।


वही पेड के कागजी निम्बू की ताजी महक पता नहीं कहाँ से हवा लेकर आयी थी आज सुबह सुबह। बहुत ढूँढने पर भी मिला न कहीं वैसा कोई पेड। झील का किनारा। घने पेड पौधे हो सकता है कहीं हो भीतर छुपा कोई निम्बू का पेड।


पर वो महक बेचैन कर गयी। घुमा लायी गाँव। गाँव जो बहुत पहले छूट गया। बचपन का गाँव लड़कपन का गाँव बेटियों का पराया गाँव । पर मेरा बहुत अपना है आज भी वो। मन में बसता है। हँसता है खिलखिलाता है कभी हँसाता कभी रुलाता है। हाँ मेरा गाँव उसकी यादें वहाँ के लोग मेरे भीतर बड़े गहरे बसे हैं। उनसे मिलने के लिए कभी कोई पूरबैया या निम्बू की महक ही काफ़ी है।

मंगलवार, 16 जून 2020

!! तनाव का उपचार ज़रूरी है पर संवेदनहीनता सबसे बड़ा रोग !!


इतना कष्ट इतनी पीड़ा
इतना प्रेम इतनी चिंता

हर ओर आँसू बहाते लोग
फिक्र परवाह लुटाते लोग

दूर की मौत से इतने टूटे
घर में उन्हें क्यूँ न दिखते रूठे

सिसकियाँ भी सुनायी न देती
कातर पुकार की भी अनदेखी

इन निष्ठुर रिश्तों को भी तो
एक बार बढ़ समझाते लोग
आसपास के रिश्ते नातों में भी
काश फिक्रमंद हो जाते लोग

चीखती आँखें रोती बातें
रिश्तों के नाम पे सिर्फ़ सन्नाटे
भीड़ में अलग पड़े अकेले को
जीते जी भी तो अपनाते लोग

अच्छा है दुःख जताना
शोक मनाना आँसू बहाना
सदा ही कष्ट देता मन को
असमय किसी प्रिय का जाना

पर अभी बहुत हैं ज़िंदा ऐसे 
मानो मरने की राह तके जैसे
उन्हें जीने की वजह दे आते 
वहाँ भी संवेदना जताते लोग

कौन नहीं जिसने देखा न हो
बेवजह पीड़ित सीधा इंसान
आँखों के सामने होता अपमान
निकल गया कह के अपना न काम

कैसे ऐसे होते हैं लोग
छोटे छिछले हल्के लोग
तनाव का उपचार ज़रूरी है
पर संवेदनहीनता सबसे बड़ा रोग

गाँव से ले शहर तक फैला
हर आँचल है इससे मैला
ठीक कि भोगे सब अपना कर्म
चुप्पी से भर रहे हम भी थैला

पास की ज़्यादती पे मूक मौन
दूर से दर्द पे कूद कूद के शोर
कितने नक़ाबों से ढका आदमी
सच में इसका न है कोई तोड़

काश बोलने के मौक़ों पे चुप न रह जाते लोग
जाने के बाद बोल रहे जीते जी कह पाते लोग 

मंगलवार, 9 जून 2020

!! हे गिरिधर माँ को मेरे अपना लेना !!




शान से ईमान से
खड़ी रही
डटी रही
झुकी नहीं
हटी नहीं

डरना तो आता नहीं
चोर नहीं तो डरूँ क्यों
मुँह की बात मुँह पे
पीठ पीछे करूँ क्यों

अब तो अपने
शर्तों पे जीना सीख रही थी
अपनी कहानी
खुद के हाथों से लिख रही थी

घर की नींव
हम सबकी हिम्मत
न खुद टूटती
न औरों को बिखरने देती

कोई समस्या
कोई परेशानी
बेटा बेटी पति भी पीछे
स्वयं को आगे कर देती

आज भी सबसे आगे बढ़कर
चिर निद्रा में सबसे पहले सो गयी
कितना करती थक गयी वो भी
नीचे का निपटा ऊपरवाले की हो गयी

रखना ख़्याल प्रभु उसका
बहुत थककर गयी है नीचे से वो
इस दुनिया में फिर न भेजना
बहुत छलकर गयी है नीचे से वो

अपनी शरण में जगह देना
रोज़ करूँगी स्तुति मैं तेरा
तेरे हवाले है मोहन अब तो
सबसे बड़ा खजाना मेरा

ध्यान रखना
फिर न भेजना
हमारी उसे याद न आए
ऐसे उसे अपना लेना

हे गिरिधर माँ को मेरे अपना लेना।


बुधवार, 3 जून 2020

गर्भवती हथिनी को मार डाला। हाँ मारा ही न।

फिर कहते हैं हम इंसान कि प्रकृति इतनी क्रूर क्यूँ हो रही है? हे बेज़ुबान की हाय दर्द पीड़ा जो कह ले उस तक पहुँचती है। माँ है प्रकृति। उसके लिए सब बच्चे बराबर। बिना भेदभाव। उससे कुछ नहीं छुपा। सजा देती है। पर कभी कभी एक के कर्मों की सजा में कई झुलस जाते हैं। शायद इसलिए भी कि बोलने के समय चुप रह गए थे। हम अनदेखा कर देते हैं पर प्रकृति नहीं करती। हमारी तरह वो अधीर नहीं। धैर्य धरती है, समय देती है फिर प्रतिकार करती है। पर कोई भी अपने कर्मों का हिसाब लिए बिना छूट नहीं सकता।

एक गर्भवती हथिनी। मूक भाषाविहीन माँ अजन्मे बच्चे को धारण किए सहज ही स्नेह की पात्र होती है। गर्भावस्था तो मन को वैसे भी कोमल कर देता, माँ के प्रति संवेदनशील फ़िक्रमंद कर देता है। पर वो कैसा हृदय जिसमें प्रेम तो दूर इतनी क्रूरता भरी कि उस गर्भवती हथिनी को मार डाला। हाँ मारा ही न। अब पोषण के लिए तो पटाखे खिलाए नहीं होंगे। क्रूरता भी छल से नासपाती में मिलाकर।

सोचकर देखें। कितने मन से ललचकर खाया होगा उस माँ ने नासपाती। कहते हैं माँ के मन से भावनाओं से अजन्मे बच्चे का भी तार जुड़ा होता है। वो भी शायद ललचाया हो चहका हो। जो भी हो। छली गयी वो माँ। फट गया पटाखा। जबड़े टूट गए। कराह कराह कर अजन्मे बच्चे समेत इंसान की क्रूरता की बली चढ़ गयी वो।


फिर क्यूँ न प्रकृति दंडित करे हमें। हम ऐसे इंसान बना रहे हैं। हाँ सोच संवेदनहीनता में तो परवरिश शिक्षा का भी बहुत बड़ा योगदान होता है न। हथिनी चुप रह गयी,सब सह गयी पर न प्रकृति अनदेखा करेगी न ही प्रकृति के भी ऊपर उसका नियंत्रक।

बाक़ी हम क्या करें? डरे और क्या? ऐसी सोच से।

मंगलवार, 2 जून 2020

!! हर रंग की ज़िंदगी का मोल है !!


घर की बिटिया साँवली
इसका ब्याह कैसे होगा 
बेसन चंदन हल्दी लेप 
कुछ इसका रंग निखरेगा 

ज़्यादा होगा देना लेना 
हो सकता है पैर पकड़ना 
जब अपनी बेटी है साँवली 
किसी और को क्या दोष देना 

बहू भी लाएँगे गोरी चिट्टी 
दामाद भी गोरा ही अच्छा 
सांवला गोरा पहली कसौटी 
जब भी पैदा हो कोई बच्चा 


तेरी बहन तो गोरी है कैसे तू काली  
वो माँ पे लगता चली गयी तू
नयन नक़्श तो बहुत है बढ़िया 
रंग के मामले में छली गयी तू 

बोली नहीं सोच तक समाया 
ये रंग भेद बहुत पुरानी बीमारी 
कितने बाल मनों की कोमलता 
इसने है हँस हँस कर मारी 


जाकर बताए साँवली बेटी को 
वो कितनी सुंदर अनमोल है 
फिर समझाए दुनिया को भी 
हर रंग की ज़िंदगी का मोल है 

रंगभेद पे बड़ी बड़ी बातें मंच से जाके चिल्लाएँगे 
घर में साँवली बेटी को गोरेपन की क्रीम दिलवाएँगे 




शनिवार, 16 मई 2020

मैं दिहारी मज़दूर, मैं बिहारी मज़दूर


मैं दिहारी मज़दूर
मैं बिहारी मज़दूर

प्रधानमंत्री कहते सवा सौ करोड़ देशवासियों की बात। पर समाचार वाले कहते बिहारी मज़दूर। हम हिंदुस्तानी नहीं। हम बिहारी हैं। जहां है वो रखना न चाहता जहां के है वो लेना न चाहता।

हिंदुस्तान में  हम बिहारी मज़दूर कहलाते बिहार में कहते हैं प्रवासी मज़दूर।

कहाँ के हैं हम वासी मज़दूर?

कोई कहता हमारे यहाँ आए क्यों?
कोई कहते गए क्यों थे अपना गाँव छोड़?

शौक़ था क्या साहिब?

आप भी तो जाते हो अमेरिका इंग्लैड

पर आप उड़कर आते हो
लाए जाते हो
पर हम

छोड़ो हमारी औक़ात नहीं ये पूछने की


मज़दूर भी कहाँ रहे मजबूर कहो साहिब।

पैदल चलने को मजबूर। जंगल खेत लांघने को मजबूर। नदी पार करने को मजबूर।

मीलों छाला लिए पाँवो में न रूकने को मजबूर। ट्रेन का सफ़र साइकिल से तय करने को मजबूर।

पटरी पर सो गए तो सबने बहुत ज्ञान दिया। जाहिलों पटरी सोने की जगह होती है क्या?
वहाँ सोओगे तो ऐसा होगा ही?

ज्ञानी साहिब लोग इसबार तो सड़क पे थे। फिर क्यों?
ट्रक को भी भी पता था क्या कि ये दिहारी हैं, बिहारी हैं, अपने पराए सब सरकार पे भारी हैं?

हम नहीं कहते कि हमें वन्दे मातरम कर हवाईजहाज़ से लाओ। हमें हमारी हैसियत में रहने आता है। पर कुछ तो हो।

बच्चे पीठ पर लादे ज़्यादा चला नहीं जाता पर रूके भी तो कहाँ किस आस में।

मेहनत पे तो सवाल मत ही उठाना कम-से-कम। अरे बैलगाड़ी में बैल के साथ खुद जुतकर हम अपने घरों को चल रहे हैं।

ये शहरों की गालियाँ किनारे जहां खड़े होकर तुम पानी पूरी बड़ा पाव चाट से अपने जीवन में मसाला भरते थे। वो सब तो फिर तुम्हें मिल ही जाएगा। अरे पैसे हैं तुम्हारे पास। पैसे से सब हो जाता है। पैसे होते तो हम भी सड़क पे नहीं होते। होते कहीं लाइव कविता कहानी पढ़ते। ज्ञान देते लेते।

ठीक है आपके पास घर पैसा खाना है। तो करो लाइव। हमें क्या दिक़्क़त। शायरी पढ़ते पढ़ते मन उकता जाए तो न्यूज़ में हमें भी देख लेना।

कुछ नहीं तो कविता के लिए ही कुछ करुण रस मिल जाए।


ये बीमारी जब ख़त्म होगी। कभी तो होगी न। चाहे हमारे ख़त्म होने के बाद ही। फिर से रिक्शा  पर चढ़ोगे तो मुझे याद करोगे।

क्यों करोगे? फिर कोई न कोई बिहारी अपने गाँव से शहर रिक्शा चलाने आ ही जाएगा। जाएगा भी तो बेचारा कहाँ? अरे आत्म सम्मान के लिए भी पेट में रोटी चाहिए न। अब भूखे पेट कैसे ग़ुरूर दिखायेंगे। आप चिंता न करो हम फिर शहर आएँगे, फिर ठेला लगाएँगे,रिक्शा भी चलाएँगे, टिफ़िन भी पहुँचाएँगे, हम बिहारी मज़दूर हैं भला और कहाँ जाएँगे।

हँ हम न भी बचे तो बहुत हैं हमारे यहाँ और आएँगे। आपकी अट्टालिका बनाएँगे। गरम खाना खिलाएँगे।


ग़ुस्सा क्यों हो रहे हो? हमने कब कहा कि हम एहसान कर रहे हैं? हमें पता है कि तुम पैसे देते हो हर काम के बदले?

हमें काम भी चाहिए पैसा भी चाहिए
हम फिर आएँगे, हम फिर सिर झुकाएँगे

हमारे यहाँ दोनों में से कुछ भी नहीं। हम कहाँ जाएँगे।

कोई रोके नहीं
कोई बुलाए नहीं
ये सड़क भी सलामत
घर हमें पहुँचाये नहीं

हम दिहारी मज़दूर
हम बिहारी मज़दूर

हम दिहारी मजबूर 
हम बिहारी मजबूर 

हम फिर शहर आएँगे।





रविवार, 19 अप्रैल 2020

!! धर्मनिरपेक्ष होने का क्या मतलब सनातनी होने पे शर्मिंदा होना !!


धर्मनिरपेक्ष होने का क्या मतलब 
सनातनी होने पे शर्मिंदा होना 
हर साधु को आसाराम और 
हर संत को रामरहीम कहना 

बिन पढ़े वेदों की निंदा और 
पुराणों को काल्पनिक बताना 
गीता रामायण की गूढ़ बातें 
फूहड़ता से हल्का कर जाना 

अर्चन पूजन को ढोंग बता 
राम कृष्ण का मजाक उड़ाना 
ढूँढ ढूँढ विरोधाभाषी बातें 
निश्छल मनों को  बड़गलाना  

मनमर्जी से कुछ भी समझाना 
बिन सिर पैर का आरोप लगाना 
जो लिखा ही नहीं उसे भी पढ़ाना 
मंत्रों  तक का भी रिमिक्स बनाना 

ये छद्म धर्मनिरपेक्षता भीष्म की
चुप्पी कुंठा विवशता न बन जाय 
और हमारे सामने हमारी संस्कृति 
रोटी बिलखती टूटती रहे असहाय 

टीवी पे रामायण चले और सड़क पर साधु मारा जाए


टीवी पे रामायण चले
और सड़क पर साधु मारा जाए
इससे साफ़ इससे सटीक
कलयुग और क्या रूप दिखाए

पुलिस खड़ी है सामने
मार दिया निहत्था साधु लहू लपेटे
चिंता की कोई बात नहीं
साधुओं के न होंगे आंतकवादी बेटे

साधुओं का कोई अधिकार नहीं
उनके लिए कहाँ मानव आयोग
उनके लिए न जलेगी मोमबत्ती
न ही होगा अदालत का प्रयोग

हिंदुस्तान में साधु मार दिया
सरेआम दिन दहाड़े बिना डरे
वोट भी देता था कि नहीं तो
उसके लिए कोई क्यों लड़े

ये महामारी ये डर औ दहशत
हमारे कर्मों  का ही संताप है
हर आम इंसान की तरह ही
साधु को मारना भी पाप है

कोई थूके बाँटता फिरे मौत
पत्थर से कर दे बेहाल इंसानियत
फिर उसके साथ खड़ी भीड़
ज़रा खुद ही देख लो अपनी नियत

इतनी दिक़्क़त भगवा रंग से
इतनी नफ़रत साधु संत से
इनके सिर जो घृणा का भूत
झड़वा दो यूपी वाले महंत से

सोमवार, 30 मार्च 2020

!! कैसे करेंगे खुद को माफ़ !!


सड़कों पर पसरा सन्नाटा
घर में ख़त्म है आटा
शायद प्रकृति लौटा रही
अब तक जो था बाँटा

अनियंत्रित हो जाए जब हम
कर न पाए ख्वाहिशें कम
अपनी दुनिया में ही जब
घुटन से निकलने लगे दम

तब कमान संभालती प्रकृति
हाथ में ले लेती वो नियति
सब खंगाले सब संभाले
रखती न,फिर वापस कर देती

ये बीमारी ये भीषण लाचारी
दुनिया में फैली ये महामारी
हमारे खुद के किए ये कांड
हमारी खुद की ही ज़िम्मेदारी

हवा पानी जल कुछ न छोड़ा
हद से अधिक है उसे निचोड़ा
कुछ की काली करतूतों ने
आज मानवता तक को तोड़ा

लौटा देगी दुनिया वापस
प्रकृति करके उसे फिर साफ़
वो तो माँ है दरियादिल है
पर कैसे करेंगे खुद को माफ़

माफ़ी इस अराजकता की
माफ़ी मौन हुई मानवता की
माफ़ी भूखे गरीब बच्चे औरत
सड़क पर आयी सारी जनता की


बुधवार, 24 जुलाई 2019

!! अपापविद्धम है राम का नाम !!



हर जन में हर कण में
सुप्त जागृत हर मन में
स्थूल सूक्ष्म जड़ चेतन में
रूके थके चलते जीवन में

हर जगह समाहित पूरनकाम
जरा समझाओ कहाँ नहीं राम
सबरी केवट निषाद अहिल्या
या हो वानर भालू रीछ राक्षस


सबको अपनाया गले लगाया
संभावी के मन न भेद आया
हर जीव पाए इनमें आराम
सबके हितैषी औ स्वामी राम

जिह्वा पर आए तो प्रेम बढ़ाए
पत्थर पे लिखे तो वो तर जाए
कलि में प्रभु इसी रूप में आए
सारे शास्त्र हमें यही समझाए

सर्व समर्थ जीव का परम विश्राम
राम-सा कृपालु है राम का नाम
जो जपे इसे वो जीवन है धन्य
इसका कहाँ कोई विकल्प अन्य


अद्भूत अलौकिक आनंददायक
दिव्य अनुभूति न कि पाप पुण्य
कलियुग में करता ये प्रभु का काम
कहे संत राम से बड़ा राम का नाम

अपना स्वार्थ न थोपो इसपर
सदियों से है हमें गर्व जिसपर
राम का नाम न होगा कभी निर्भर
इसकी उसकी किसी मूढ़ मति पर

जीवन ध्येय आनंद का धाम
अपापविद्धम है राम का नाम
जय श्रीराम

शुक्रवार, 7 जून 2019

!! आसूँ नहीं सूखी हैं आँखें शर्म से छोड़ दिया बहना !!


है हताशा निराशा लानत
बेबसी व मन का कचोटना
हिम्मत नहीं पढ़े पूरी ख़बर
मन नहीं बंद करता टोकना

आसूँ नहीं सूखी हैं आँखें
शर्म से छोड़ दिया बहना
खलता अब बहुत ज़्यादा
हैवानों को यूँ ज़िंदा रहना

हैवानियत दरिंदगी से भी नीचे
गिद्ध की तरह बच्ची को नोंचना
बस अपराधी की ग़लती है क्या
क्या हमको नहीं चाहिए सोचना

कितने दरिंदें छूट गए यूँ ही
तभी तो नहीं सीखा संभलना
अब काट दो हाथ पहले कि
पहुँचे ये हमारे घर के पलना

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

!! श्रीरामचंद्र !!



इक्ष्वाकुवंश में हुए अवतीर्ण

सच्चिदानंद स्वयं भगवान

राम नाम से जाना जग ने

अद्भूत अलौकिक धैर्यवान



मन वश में इंद्रियाँ वश में

नीतिज्ञ वक़्ता बुद्धिमान

शत्रुसंहारक परम मनोहर

सौंदर्य मानो शोभा की खान



सुंदर कंधे विशाल भुजा

शंख-सी ग्रीवा ठोढ़ी महान

चौड़ी छाती सुकंठ सुललाट

शत्रुनिषूदन तेजस्वी बलवान



आजानुभुज चाल मनहर

देह सुडौल कांतिवान

स्निग्धवर्ण पुष्ट वक्ष

सुंदर नेत्र चलायमान



धर्म के ज्ञाता सत्यवादी

ज्ञान से पूर्ण समाधिमान

प्रजापालक दीनबंधु यशस्वी

शुभलक्षण युक्त शोभायमान



पवित्र पालक सर्वभूत रक्षक

वैरीविध्वंशक प्रतापवान

अखिल वेद ज्ञाता धनुर्धर

तीक्ष्णबुद्धि प्रतिभावान



उदार हृदय सद्विचारी

मितभाषी स्मृतिवान

सदैव संभाव प्रियदर्शन

सर्वलोक हितैषी लक्ष्मीवान



साधुप्रिय सर्वगुण सम्पन्न

बल में साक्षात विष्णु समान

सिंधु सा गांभीर्य धरे और

धैर्य में हो जैसे हिमवान